सोमवार

मेरे प्रश्‍न को हल कर दो

जरा सुनो मेरे प्रश्‍न को हल कर दो
तुमने तो पी.एच.डी. कि‍या है
डि‍ग्रि‍यों से तुम्‍हारा घर भरा है
मौलवी साहब रूकि‍ए
अच्‍छा ज्‍योति‍षी जी आप ही सुनि‍ए
अरे कोई तो मुझे बताओ
यह जो खून बि‍खरा पड़ा है
मज़हबी दगों की भेटं चढ़ा है
यह खून कि‍सका है
हि‍न्‍दू का है या कि‍सी मुसलमान भाई का
कि‍सी सि‍क्‍ख का है या फि‍र इसाई का
किसी और का है तो भी बताओ
जरा सुनो मेरे प्रश्‍न को हल कर दो
ऐसी भी क्‍या खता हो गई
जो तुम सुनते भी नहीं
जरा सी बात पूछता हूं
यूं फर्क बता देते हो लाखों
दगों के वक्‍त बताते हो
अब भी बता दो मुझको
जरा इस खून की पहचान करो
फायदे में रहोगे तुम
बि‍मार हो जाओगे कभी
तो देंगें खून तुम्‍हे तुम्‍हारे मजहब का ही
पर अफसोस
तुम नहीं बता सकते
यह जो सुर्ख हुई है धरती
इस पर खून पड़ा है
वो इक इन्‍सान का है
इसलि‍ए चुप हो जाओ
खामोश
क्योंकि मजहब नहीं सि‍खाता
आपस में बैर करना
क्योंकि खून से बड़कर रि‍श्‍ता कोई नहीं
फि‍र तुम सब का तो खून एक सा है
नहीं मानते हो तुम अगर
'जालि‍म' तर्क से समझाओ
और मेरे प्रश्‍न को हल कर दो
लेकि‍न तुम नहीं कर सकते
इसलि‍ए हर जीवन में खुशी का रंग भर दो

शनिवार

मयखाने की दास्‍तां......................

मयखानों में पीने वाले भी क्‍या पीते हैं
चन्‍द पलों के नशे के बाद फि‍र दुनि‍या में जीते हैं

मदहोश तो वो होते हैं 'जालि‍म' जो सदा नशे में रहते हैं
जाम नहीं छलकाते वो महबूबा की आखों से जो पीते हैं
मयखानों में जाने वाले पैमानों को आजमाने वाले
जाम खत्‍म हो जाने पर तन्‍हा तन्‍हा रह जाते हैं

चैन तो मिलता है उनको जो बि‍ना कि‍सी पैमाने के
आखों में आखें डाले अपनी प्‍यास बुझाते हैं

कुछ एसे भी होते हैं 'जालि‍म' जो रोते हैं चि‍ल्‍लाते हैं
दि‍ल के टूटने के बाद मयखाने चले जाते हैं
वो पागल नहीं जानते मयखाने के जाम पल भर याद भुलाते हैं
नशा उतरता है जैसे ही 'जालि‍म' फि‍र अश्‍क बहाते हैं
मयखानों मे जलने वालो रफ़ता रफ़ता मरने वालो
क्‍यों काफि‍र जग के जुमले सहते जाते हो
जामों से क्यों खुद को तड़पाते हो
नि‍त जीने का नशे में रहने का इक राज तुम्‍हे बतलाता हूं
ना कह देना कि‍सी से कि‍ मैं भी इसको अपनाता हूं
नशे के आदि‍ हो तो पी तो महबूबा आखों से पी लो
जाम नहीं, पैमाने नहीं दि‍न रात फि‍र जन्‍नत में जी लो

शुक्रवार

जमीं वाले चादं की कहानी

इक चादं एसा भी है जि·समें दाग़ ही नहीं है
इत्तेफाक यह भी अजब है बेदाग चादं आसमां में नहीं है
जान लो अब वो राज भी तुम जो कभी दफन हो गए
इक भूल हो गई खुदा से और दोनों चादं ही बदल गए
हुआ यूं कि दाग़ जिस चादं में था वो तो सितारों में रस गया
और कुदरत का करिश्मा देखिए बेदाग चादं जमीं पे बस गया
खैर थी इतनी भी 'जालिम' पर हद तो तब हो गई
जमीं बाले चादं के दीदार करने की इजाजत जब हमें मिल गई
बात इतनी भी होती तब भी खैरियत थी
पर सच मानिए उन्हे देखते ही हमें मोहब्बत हो गई

रूस्‍वाइयां.................

हिफ़ाजत से संभाल कर रखा था दिल कमबख्त पल भर में तोड़ कर चले गए
मेरे जिगर की वि·रासत के टुकड़े महबूब की गलियों में बिखर गए

वो शायद चौदहवीं की रात थी और मौसमे बरसात थी
सनम चले जा रहे थे अकेले ही नामालुम क्या बात थी
पछियों की ना जाने कैसी चहचाहट हुई जमीं पर से इक चमक उनके पेहरे पे आ गिरी
उनके हुस्ने-फ़सूंसाज की झलक थी हर खिश्त पे जिस शय से उनकी नज़रें जा मिली
पहले जु़ल्फ़ों को संवारा बडे अदब से फिर शीशा समझ वो टुकड़े उठा लिए
अपनी सूरत को परखा हर खिश्त फिर यकज़ा कर वो सुर्ख टुकड़े बगल में झुपा लिए
मुकाम पे पहुचं कर सनम को फिर उन सुर्ख टुकडों का ख्याल आया
बुलन्द रोशनी में दस दफ़ा मेरे दिल की शहजादी ने उन शीशों का दीदार पाया
छुप ना सका ना सका वो राज अब जिसे कभी हमने बड़े जतन से छुपाया था
शीशे नहीं मेरे दिल के टुकड़े थे वो 'जालिम' जिनको सनम ने रस्ते से उठाया था
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