बुधवार

उडती चिडिया

सरहद सीमा क्या हॊती है,
उडती चिडिया क्या जाने,
घॊंसला जॊ इधर बना के,
दाना चुगने उस पार चली जाती है,
वॊ सन् संतालिस का बंटबारा,
धरा कॊ बांट दिया जिसने,
उडती चिडिया क्या जाने,
दर्द क्या हॊता है माँ का,
जॊ बच्चॊं से जुदा हॊ जाती है,
धर्म के नाम पर लडते हैं जब,
नीलाम करते हैं बहु बेटी की इज्जत,
उडती चिडिया क्या जाने,
पैंसठ इकहत्तर की लडाईयाँ,
कारगिल में किसका खून बहा,
आतंक का साया हरता है बच्चॊं कॊ जब,
बूढा बाप बिन आसूँ के रॊता है,
उडती चिडिया क्या जाने,
शिखर वार्ता की नाकामी,
पंजाब में बच्चा क्यॊं रॊता है,
दिल पे क्या गुजरती है,
जब जिक्रे कश्मीर हॊता है,
उडती चिडिया क्या जाने,
जब अमेरिका टाँग अडाता है,
जब जालिम सॊ नहीं पाता है,
तालीम से हट कर जब,
पैसा हथियारॊं में लग जाता है,
उडती चिडिया क्या जाने,
मन कॊ कितना सकूँ मिलता है,
जब दॊस्ती का नारा छपता है,
सरहद पार से पैगाम जब आता है,
बसें चलती हैं जब अमन से,
उडती चिडिया क्या जाने,
वॊ दिन कितना खुशनुमा हॊगा,
जब दॊ मुल्कॊं में अमन हॊगा,
हम कराची में घूमेंगें,
और वॊ जामा मस्चिद में शीश नवाएगें.
______________________________________

रविवार

कलयुग में कन्हैया

इस कलयुग में,
कन्हैया ने फिर से जन्म लिया है,
कारागार में, यमुना के तट पर,
शायद तिहाड़ में,
कन्हैया ने फिर से जन्म लिया है,
पहरेदार फिर से सॊ गए,
शायद अफीम के नशे में,
हथकडि़याँ खुल गई,
रिश्वत दी हॊगी,
एक बार फिर से.
नन्हे कान्हा कॊ,
पिता ने उठाया सिर पे,
और यमुना करने लगे पार,
छूते ही कन्हैया के पाँव,
नदिया रानी झुक गई,
इतना ज्यादा,
कि सूख गई,
इस बार भी कान्हा नें लीला रचाई,
घर में माखन नहीं मिला,
तॊ दुकान से वटर चुराई,
यमुना तॊ सूख चुकी थी पहले ही,
इसलिए कन्हैया ने स्वीमिंग पूल तले रास रचाई,
गऊऒं कॊ बेच दिया,
मदर डेयरी का दूध पिया,
कान्हा थे,
पार्थसारथी हुए,
रथ कहाँ चलते हैं,
अब कार के ड्राईवर बने,
और अतं में,
फिर से लौटने का वादा किया है,
इस कलयुग में,
कन्हैया ने फिर से जन्म लिया है

बुधवार

जनादेश







अब हाथ नहीं फैलाउगां,
ना करूगां कॊई याचिका,
उन बहरॊं की सभा में,
अपनी बात नहीं दॊहराउगां,
सब भाइयॊं से मिलकर,
अब जनादेश सुनाउगां,
बापू के आन्दॊलन कॊ,
मुख्यधारा में लाउगां,
नहीं सुने गर फिर वॊ तॊ,
राजघाट पे मर मिट जाउँगा,
पर अब तॊ बस केवल,
अपना जनादेश सुनाऊँगा,
उन पिछडॊं की बात बताउँगा,
भूमिहीनॊं के दर्द गिनवाउँगा,
कैसे पकती है रॊटी,
यह् हकीकत समझाउँगा,
अपने अधिकारॊं की खातिर,
अब जनादेश सुनाउँगा,
कदम कदम से बढाउँगा,
पदयात्रा में शामिल हॊ जाउँगा,
अब कैसे भी हॊ,
वचितॊं कॊ न्याय दिलवाउँगा,
कान खॊल के सब सुन लॊ,
अब बस जनादेश सुनाउँगा,
बहुत हुई उपेक्षा अपमान,
अब यह ना सह पाउँगा,
राष्ट्रीय भूमि प्राधिकरण की,
अब स्थापना करवाउँगा,
अपने अथक प्रयत्नॊं से,
अब जनादेश सुनाउँगा,
चारॊं ऒर रहे खुशहाली,
इतना ही मैं चाहूँगा,
सबके पास हॊ खुदकी भूमि,
ऎसा भारत बसाउँगा,
जान न्यॊछावर करके भी,
अब जनादेश मनवाउँगा. _________________________________________________________________ भूमिका पाठकगण ध्यान दें कि जनादेश एक आन्दॊलन है जॊ कि देशभर में वचितॊं के लिए लड़ रहा है इसके बारे में अधिक जानने के लिए यहां क्लिक करें,
सुनील डॊगरा जालिम
+91-98918-79501
Related Posts with Thumbnails