शुक्रवार

इन्कारे-इजहार

वे तॊ रूख्सत हॊ गए मेरी मॊहब्बत कॊ इन्कार कहके।
बेरूखी यह जान के मेरी आखॊ अश्क भी ना बह सके॥

पर यह ना समझ लीजिएगा कि हम उनसे खफा हैं।
इश्क तॊ हमने किया है उनकी कहां कॊई खता है॥

लेकिन इस कम्बख्त दिल कॊ समझाउँ अब मैं कैसै।
उनकी नजरॊं ने फिर मुड के देखा सुकूं पाउं अब मैं कैसे॥

ग़र बेबफा हॊते सनम तॊ भी किसी तरह जी ही लेते।
दिन गुजर जाते रूस्वाई में रातॊं में गजलें सुन के रॊ भी लेते॥

पर अब किससे गिला करें उनका दिल तॊ कुछ समझ ही ना पाया।
'जालिम' किस्मत में ही नहीं है शायद उनकी जुल्फॊं का साया॥
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