रविवार

कलयुग में कन्हैया

इस कलयुग में,
कन्हैया ने फिर से जन्म लिया है,
कारागार में, यमुना के तट पर,
शायद तिहाड़ में,
कन्हैया ने फिर से जन्म लिया है,
पहरेदार फिर से सॊ गए,
शायद अफीम के नशे में,
हथकडि़याँ खुल गई,
रिश्वत दी हॊगी,
एक बार फिर से.
नन्हे कान्हा कॊ,
पिता ने उठाया सिर पे,
और यमुना करने लगे पार,
छूते ही कन्हैया के पाँव,
नदिया रानी झुक गई,
इतना ज्यादा,
कि सूख गई,
इस बार भी कान्हा नें लीला रचाई,
घर में माखन नहीं मिला,
तॊ दुकान से वटर चुराई,
यमुना तॊ सूख चुकी थी पहले ही,
इसलिए कन्हैया ने स्वीमिंग पूल तले रास रचाई,
गऊऒं कॊ बेच दिया,
मदर डेयरी का दूध पिया,
कान्हा थे,
पार्थसारथी हुए,
रथ कहाँ चलते हैं,
अब कार के ड्राईवर बने,
और अतं में,
फिर से लौटने का वादा किया है,
इस कलयुग में,
कन्हैया ने फिर से जन्म लिया है

14 टिप्‍पणियां:

  1. Hi,Sunil. Kalyug ka sahi chitran kiya hai,apni kavita mei aapne.

    एक बार फिर से.
    नन्हे कान्हा कॊ,
    पिता ने उठाया सिर पे,
    और यमुना करने लगे पार,
    छूते ही कन्हैया के पाँव,
    नदिया रानी झुक गई,
    इतना ज्यादा,
    कि सूख गई,

    bahut achhi panktiya likhi hain.

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  2. अच्छा लिखा है, वर्तमान का अच्छा चित्रण मगर मित्र कसावट में कुछ कमी झलक रही है, बधाई स्वीकार करें।

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  3. "कविराज" जी की टिप्पणी से पूरी तरह सहमत हूँ ।
    रचना ठीक बन पडी है,
    पर इतनी अच्छी भी नही कही जा सकती ।

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  4. बहुत अच्छा लिखा है ...बधाई...

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  5. कोशिश अच्छी है... पर और भी लिखा जान था.. तीव्र्ता में भी थोड़ी कमी है. ये कोई आलोचना नहीं .. बस चाह्ती हूं और अच्छा लिखिये.. क्योंकि आप लिख सक्ते हैं..

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  6. main na hi yahan k baaki logon ki tarah likhti hoon aur shayad mujhe iske vishay mein zyada maalum bhi nahi hai....isliye apne level ki tippani kar rahi hoon...:-D..
    Kanhaiyya k jeevan aur Sarcasm ka mishran bana k aapne Kalyug ka almost poora hi varnan kar daala...:-D....awesome....Seedhe saade shabdon se teer chalana to koi aapse seekhe!!!:-D

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  7. कन्हैया को हैप्पी बर्थडे!

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  8. बढिया । लेकिन मैं गिरिराज जी से थोड़ा सहमत हूँ। और बढिया हो सकता था।

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  9. bahut khoob ...accha paryaas hai aapka ....

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  10. सुनील, लिखते रहो। अच्छी व्यंग्यात्मक कविता है।

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  11. उपर इतने बड़े कवियों की टिप्पणी देख कर तो हम साहस ही नहीं कर पाए. भाई हम कविता तो लिख नहीं सकते लेकिन पढ़ने का आनंद लेते है. अच्छा लिखा है. बधाई.

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  12. Rodrigo6/21/2007

    Oi, achei teu blog pelo google tá bem interessante gostei desse post. Quando der dá uma passada pelo meu blog, é sobre camisetas personalizadas, mostra passo a passo como criar uma camiseta personalizada bem maneira. Até mais.

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  13. Jalim ji ..aap to bade jalim nikle....kalug mai bhagwan krishan ka warnan kar dala....wase thik hai ...yah waqt ki mang hai ki dwapar yug tatha kalug ke kanheya ke bich ke phark ko samjha jaye...sachmuch aaj ka kanheya aisa hi hai..
    kavita bahut achhi tatha sach ko prdarshit karti hain...
    ek baat or kahna chaunga ki jara RODRIGO ji ko kahiye ki we himachli bhasha mai na likh kar hindi ya english mai likhe , jisse hum bhi samajh sake...

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  14. सुनिल डोगरा जी यह कविता नही है। यह अपके द्वारा क्रिष्ण लीला को कु-द्र्श्य में प्रस्तुत करने का अपराध है। ईसे संशोधित करो और कलियुग की व्यथा को किसी और भाव मे प्रस्तुत करने का प्रयास करो।

    जय श्री क्रिष्णा!!

    परम लौ

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