शुक्रवार

काश! मैं परि‍पूर्ण होता

अकेला सा महसूस करता हूं
सौ करोड़ से ज्‍यादा की भीड़ में
इसलि‍ए सोचता हूं
काश! मैं परि‍पूर्ण होता
हर काम अपने दम पे करता
कदम बढ़ाता समाज कल्‍याण की राह पर
पर कभी कि‍सी से मदद ना मांगता
सोचता हूं मैं दीपक होता
अ‍ंधि‍यारा मि‍टाता इस जग का
फि‍र ख्‍याल आता है कि‍ तब भी मैं कैसे सम्‍पूर्ण होता
तल पे अन्‍धेरा रहता नि‍त कालि‍मा उगलता
काश! मैं परि‍पूर्ण होता
हर काम अपने दम पे करता
सोचता हूं मैं दरि‍या होता
इस जग की प्‍यास बुझाता
कि‍न्‍तु यह सम्‍भव नहीं
जल से भरा रहता है समन्‍दर
पर नमकीन पानी को कौन पीता
काश! मैं परि‍पूर्ण होता
हर काम अपने दम पे करता
सोचता हूं मैं इक सि‍तारा होता
वि‍शाल गगन में नि‍शा में चमकता
पर यह भी व्‍यर्थ राहगीर को रोशनी देने में
तब भी असमर्थ रहता
फि‍र सोचता हूं
काश मैं सोमरस होता
मधुशाला में नि‍त मैं छलकता
गमगीन यादों को भुलाकर कुछ पल चैन से बसरने देता
पर अफसोस तब भी घर एजाड़ने के लि‍ए जुमले सहता
काश! मैं परि‍पूर्ण होता
हर काम अपने दम पे करता
पर लगता है इस जग में कोई नहीं सम्‍पूर्ण है
यहीं तक की खुदा भी अधूरा ही है
तभी उसके संसार में दंगा-फसाद उसी के नाम पर होता है
सच तो यह है 'ज़ालि‍म'
कि‍ स्‍वप्‍न भी अ‍पूर्ण होता है
इसलि‍ए कोई नहीं परि‍पूर्ण होता है

6 टिप्‍पणियां:

  1. प्रयास अच्छा है,
    लिखते समय व्याकरण की ओर ध्यान दे.
    पढ्के अच्छा लगा,

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  2. दीपक,दरिया,सितारा,सोमरस
    सबमें अपूर्णता का अक्स
    यही क्यू लगा
    जब जीवन प्रवाह सतत

    होने को तो एक सांस भी बहुत
    होने को मौत भी शहादत
    होने को तो एक किरकिरी भी बहुत
    होने को सच्ची पल की इबादत

    कहने को सब कुछ भले पूर्ण नहीं
    मगर अपूर्ण हो सब एसा भी नही
    कायनात है ये, होगे आगे भी जहां
    जिये हर पल जीभर, ज़िदगी है यही

    ज़ालिम जी , आपकी कविता काफ़ी ध्यान से पढने के बाद इमानदारी से जो टिप्प्णी बन पढ़ी सो दे दी आपके भाव अच्छे है, और इसी अच्छी भावना से सभी टिप्प्णियां स्वीकारें, आपमें और भी अच्छा लिखने कि असीम संभावनाए हैं शुभकामनांए.
    -रेणू आहुजा.

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  3. आप भावों से भरे हुए कवि हैं, आपके विचारों को ले कर आपसे प्रभावित हुए बिना नही रहा जा सकता, शिल्प पर थोडी मेहनत करें

    सस्नेह।

    *** राजीव रंजन प्रसाद

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  4. आपकी कल्पना बहोत अच्छी है। कुछ पक्तियाँ जैसे:

    अकेला सा महसूस करता हूं
    सौ करोड़ से ज्‍यादा की भीड़ में

    बहोत ही वजनदार हैं। मगर उन के बाद के शब्द वो वजन बरकरार रखने में कम पड़ गए।

    एक बहोत अच्छा प्रयास। आप और भी लिखें और प्रकाशित करें। हम पढ़ने आयेंगे।

    तुषार जोशी, नागपुर

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  5. anupama chauhan5/21/2007

    Hi sunil,
    aapko paheli bar padha hai.....bhaav paksh bahut prabhavi hai....aapke sabdon me revolution saaf jhalakta hai....bas thoda presentation behatar karne ki koshish karen.,....baaki sab perfect.....keep writing

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  6. सुनील सुबह से कई बार पढी है आपकी कविता मगर सोच रही थी कि क्या लिखूँ सभी की तरह क्या कोई सलाह दूँ मगर ये गलत होगा यदी मुझे कहते कविता में गलतियाँ देखनी है तो मै कविता नही पढ पाऊँगी,...मैने जो पढा तो महसुस किया की संसार में पूर्ण कौन है...आपकी कविता मगर अपने आप मे पूर्ण है,..एक बहुत ही भावुकता से भरी ...बहुत अच्छा लिखा है...मुख्यतः...
    पर लगता है इस जग में कोई नहीं सम्‍पूर्ण है
    यहीं तक की खुदा भी अधूरा ही है
    तभी उसके संसार में दंगा-फसाद उसी के नाम पर होता है
    सच तो यह है 'ज़ालि‍म'
    कि‍ स्‍वप्‍न भी अ‍पूर्ण होता है
    इसलि‍ए कोई नहीं परि‍पूर्ण होता है
    सुनीता चोटिया(शानू)

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