मंगलवार

मैं तो बस कलम चलाता हूँ


गीत और ग़ज़लें नहीं जानता
गद्य पद्य को नहीं मानता
भावों को कहता जाता हूँ
मैं तो बस कलम चलाता हूँ

निर्मल सूर्योदय को जिस दिन देखूं

पवन किरणों से लफ्ज बनाकर
प्रियतमा का चित्र बनाता हूँ
मैं तो बस कलम चलाता हूँ

सावन के मेघों से रंग ले कर

गरजती बिजली संग ले कर
फूलों से रंगता जाता हूँ
मैं तो बस कलम चलाता हूँ

हिमालय की सुन्दरता को

सिन्धु संगम से सजाकर
तस्वीर को महकाता हूँ
मैं तो बस कलम चलाता हूँ

धान के खेतों के पानी में

आँगन की खुशबु को मिलाकर
मीठे मीठे शब्दों से सजाता हूँ
मैं तो बस कलम चलाता हूँ

अर्ध
चन्द्र की उज्ज्वलता को
चंचल कलियों में लगाकर
प्रेम के सुर गाता हूँ
मैं तो बस कलम चलाता हूँ

मुझको क्या मतलब कोरी कविता से

नीरस कवियों की नकली तारीफों से
मैं प्रेम का मोती चाहता हूँ
मैं तो बस कलम चलाता हूँ

महात्मा गाधीं की आरती


जय श्री बापू प्यारे, जय हम राष्ट्रपिता हमारे।
सत्य के थे पुजारी, जय हो अहिसां के रखवारे॥
तुम हो श्रेष्ठ महात्मा तुम हो मार्गदर्शक।
तुम सबके रखवारे, तुम सच्चे पथ प्रदर्शक॥
सत्याग्रह भारतछोडो, तुम आन्दोलनकर्ता।
गिरमिट कृषक दलित, तुम सबके दुःखहर्ता॥
जय श्री बापू प्यारे, जय हम राष्ट्रपिता हमारे।
सत्य के थे पुजारी, जय हो अहिसां के रखवारे॥
दीनदयाल दयानिधि, बापू सब के हितकारी।
त्यागमूर्ति मननिश्चल, सब संशयहारी॥
ऎनक धोती लाठी चप्पल संग विचरण करते।
पितृभक्त पत्नीव्रत, बापू सबकी सेवा करते॥
जय श्री बापू प्यारे, जय हम राष्ट्रपिता हमारे।
सत्य के थे पुजारी,जय हो अहिसां के रखवारे॥
साबरमति के सन्त ने सबकी की भलाई।
सत्य अहिसां के बल पर आजादी दिलवाई॥
जो कोई प्रेमसहित गाधींवाद अपनाये,
सर्व प्रिय बन परम सुख पाए॥
जय श्री बापू प्यारे, जय हम राष्ट्रपिता हमारे।
सत्य के थे पुजारी, जय हो अहिसां के रखवारे॥
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हे राम!

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॥बापू गाधीं की जय॥

शुक्रवार

इन्कारे-इजहार

वे तॊ रूख्सत हॊ गए मेरी मॊहब्बत कॊ इन्कार कहके।
बेरूखी यह जान के मेरी आखॊ अश्क भी ना बह सके॥

पर यह ना समझ लीजिएगा कि हम उनसे खफा हैं।
इश्क तॊ हमने किया है उनकी कहां कॊई खता है॥

लेकिन इस कम्बख्त दिल कॊ समझाउँ अब मैं कैसै।
उनकी नजरॊं ने फिर मुड के देखा सुकूं पाउं अब मैं कैसे॥

ग़र बेबफा हॊते सनम तॊ भी किसी तरह जी ही लेते।
दिन गुजर जाते रूस्वाई में रातॊं में गजलें सुन के रॊ भी लेते॥

पर अब किससे गिला करें उनका दिल तॊ कुछ समझ ही ना पाया।
'जालिम' किस्मत में ही नहीं है शायद उनकी जुल्फॊं का साया॥

बुधवार

उडती चिडिया

सरहद सीमा क्या हॊती है,
उडती चिडिया क्या जाने,
घॊंसला जॊ इधर बना के,
दाना चुगने उस पार चली जाती है,
वॊ सन् संतालिस का बंटबारा,
धरा कॊ बांट दिया जिसने,
उडती चिडिया क्या जाने,
दर्द क्या हॊता है माँ का,
जॊ बच्चॊं से जुदा हॊ जाती है,
धर्म के नाम पर लडते हैं जब,
नीलाम करते हैं बहु बेटी की इज्जत,
उडती चिडिया क्या जाने,
पैंसठ इकहत्तर की लडाईयाँ,
कारगिल में किसका खून बहा,
आतंक का साया हरता है बच्चॊं कॊ जब,
बूढा बाप बिन आसूँ के रॊता है,
उडती चिडिया क्या जाने,
शिखर वार्ता की नाकामी,
पंजाब में बच्चा क्यॊं रॊता है,
दिल पे क्या गुजरती है,
जब जिक्रे कश्मीर हॊता है,
उडती चिडिया क्या जाने,
जब अमेरिका टाँग अडाता है,
जब जालिम सॊ नहीं पाता है,
तालीम से हट कर जब,
पैसा हथियारॊं में लग जाता है,
उडती चिडिया क्या जाने,
मन कॊ कितना सकूँ मिलता है,
जब दॊस्ती का नारा छपता है,
सरहद पार से पैगाम जब आता है,
बसें चलती हैं जब अमन से,
उडती चिडिया क्या जाने,
वॊ दिन कितना खुशनुमा हॊगा,
जब दॊ मुल्कॊं में अमन हॊगा,
हम कराची में घूमेंगें,
और वॊ जामा मस्चिद में शीश नवाएगें.
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रविवार

कलयुग में कन्हैया

इस कलयुग में,
कन्हैया ने फिर से जन्म लिया है,
कारागार में, यमुना के तट पर,
शायद तिहाड़ में,
कन्हैया ने फिर से जन्म लिया है,
पहरेदार फिर से सॊ गए,
शायद अफीम के नशे में,
हथकडि़याँ खुल गई,
रिश्वत दी हॊगी,
एक बार फिर से.
नन्हे कान्हा कॊ,
पिता ने उठाया सिर पे,
और यमुना करने लगे पार,
छूते ही कन्हैया के पाँव,
नदिया रानी झुक गई,
इतना ज्यादा,
कि सूख गई,
इस बार भी कान्हा नें लीला रचाई,
घर में माखन नहीं मिला,
तॊ दुकान से वटर चुराई,
यमुना तॊ सूख चुकी थी पहले ही,
इसलिए कन्हैया ने स्वीमिंग पूल तले रास रचाई,
गऊऒं कॊ बेच दिया,
मदर डेयरी का दूध पिया,
कान्हा थे,
पार्थसारथी हुए,
रथ कहाँ चलते हैं,
अब कार के ड्राईवर बने,
और अतं में,
फिर से लौटने का वादा किया है,
इस कलयुग में,
कन्हैया ने फिर से जन्म लिया है

बुधवार

जनादेश







अब हाथ नहीं फैलाउगां,
ना करूगां कॊई याचिका,
उन बहरॊं की सभा में,
अपनी बात नहीं दॊहराउगां,
सब भाइयॊं से मिलकर,
अब जनादेश सुनाउगां,
बापू के आन्दॊलन कॊ,
मुख्यधारा में लाउगां,
नहीं सुने गर फिर वॊ तॊ,
राजघाट पे मर मिट जाउँगा,
पर अब तॊ बस केवल,
अपना जनादेश सुनाऊँगा,
उन पिछडॊं की बात बताउँगा,
भूमिहीनॊं के दर्द गिनवाउँगा,
कैसे पकती है रॊटी,
यह् हकीकत समझाउँगा,
अपने अधिकारॊं की खातिर,
अब जनादेश सुनाउँगा,
कदम कदम से बढाउँगा,
पदयात्रा में शामिल हॊ जाउँगा,
अब कैसे भी हॊ,
वचितॊं कॊ न्याय दिलवाउँगा,
कान खॊल के सब सुन लॊ,
अब बस जनादेश सुनाउँगा,
बहुत हुई उपेक्षा अपमान,
अब यह ना सह पाउँगा,
राष्ट्रीय भूमि प्राधिकरण की,
अब स्थापना करवाउँगा,
अपने अथक प्रयत्नॊं से,
अब जनादेश सुनाउँगा,
चारॊं ऒर रहे खुशहाली,
इतना ही मैं चाहूँगा,
सबके पास हॊ खुदकी भूमि,
ऎसा भारत बसाउँगा,
जान न्यॊछावर करके भी,
अब जनादेश मनवाउँगा. _________________________________________________________________ भूमिका पाठकगण ध्यान दें कि जनादेश एक आन्दॊलन है जॊ कि देशभर में वचितॊं के लिए लड़ रहा है इसके बारे में अधिक जानने के लिए यहां क्लिक करें,
सुनील डॊगरा जालिम
+91-98918-79501

मंगलवार

पर अब तो मैं बड़ा हो गया हूँ

वो बचपन, वो यादें,
मम्‍मी से छोटी-छोटी फरि‍यादें,
पर अब तो...........
पर अब तो मैं बड़ा हो गया हूं,
वो फ्रॉक पहन के उछलना,
लुगड़ी के लि‍ए झगड़ना,
छोटी-छोटी चैतें करके,
छम्‍बों पे जा छि‍पना,
पर अब तो..........
पर अब तो मैं बड़ा हो गया हूं,
मम्‍मी जब दो चोटि‍यां बनाती थी,
उस पर प्‍यारा सा रि‍बन लगाती थी,
और वो गांव की चाची,
जो मुझको चि‍ढ़ाती थी,
पर अब तो...........
पर अब तो मैं बड़ा हो गया हूं,
वो दादी के अखरोट चुराना,
बड़े प्‍यार से झोऌ को खाना,
और वो लालच में,
कैन्थों के काटें चुभ जाना,
पर अब तो..........
पर अब तो मैं बड़ा हो गया हूं,
वो धान के खेतों में ऊर लगाना,
और कीचड़ में गि‍र जाना,
ताई से कहकर,
बोरी का झुम्‍ब बनबाना,
पर अब तो..........
पर अब तो मैं बड़ा हो गया हूं,
वो चोबू से गि‍र जाना,
छुपछुप के बर्फ के गोले खाना,
वो उछल उछल के,
तड़ल्‍ल को छूने की शर्त लगाना,
पर अब तो..........
पर अब तो मैं बड़ा हो गया हूँ,
बडा सा बस्‍ता लेकर स्‍कूल को जाना,
चाय के बागानों से पत्‍ति‍यां लाना,
और बकरी के दूध के संग,
बडे चाव से दतैलु खाना,
पर अब तो..........
पर अब तो मैं बड़ा हो गया हूं,
वो छरूड़ू में नहाना,
बागों से सेब चुराना,
और नन्‍हे-नन्‍हे हाथोँ से,
धौलाधार कर ऊँचाई का अनुमान लगाना,
पर अब तो..........
पर अब तो मैं बड़ा हो गया हूँ,
इस दुनि‍यादारी में,
बेकारी में, कहीं खो गया हूं,
पर अब तो..........
पर अब तो मैं बड़ा हो गया हूं,
______________________________
______________________________
भूमिका: पाठकगण ध्यान दें कि यह कविता हिमाचली परिवेश में गयी है अतः पहाडी भाषा के कुछ शब्दॊं का इस्तेमाल किया गया है जिनके मतलब नीचे दिए गए हैं साथ ही यह भी जान लिया जाए कि बचपन में घर में लडकी ना हॊने के कारण शुरूआती दिनॊं में लेखक का पालन पॊषण कन्या की तरह हुआ था अतः पाठक पंक्ति संख्या ५,११, एवं १२ के कारण शंकित ना रहें !

लुगड़ी= पतीले में चावल बनाने के बाद बचा हुआ पानी, चैतें= शरारतें ,
छम्ब= ढ़लान नुमा छॊटी पहाड़ियां, झॊ‍ऌ= लस्सी और मक्की से बना तरल खाघ,
कैन्थ= कंटीला फलदार पेड़, ऊर= धान के पौधे रॊपना, झुम्ब= खेतॊं में काम करते समय बारिश से बचने हेतु इस्तेमाल किया जाना वाला पहनावा, चौबू= कच्चे घरॊं में दूसरी मंजिल से उतरने वाला स्थान जहां सीढ़ी का उपरी सिरा हॊता है, तल्लड़= कच्चे घरॊं में स्लेटॊं के नाचे सामान रखने के लिए बनाया गया लकडी का लैंटर, दतैलु = नाश्ता, छरूड़ू = झरना.

गुरुवार

तकदीर ए ज़ालिम

कि‍सी के नाजुक हाथों से
'जालि‍म' दि‍ल टूट गया
वो चले गए और
हमसे जमाना रूठ गया
इस गम को भुलाने को
जाम जो पकड़ा मैनें
हाय रे फूटी कि‍स्‍मत
मुझसे प्‍याला छूट गया
ना जाम मि‍ला
ना मि‍ली मोहब्‍बत
जो भी मैनें चाहा
उसी को कि‍स्‍मत ने लूट लि‍या
रूस्‍वाइयों के इस आलम में
जो सजदे करने मैं चला
साकी के पैमानों ने
मुझको फि‍र से रोक लि‍या
मयखानों की राह तकते तकते
बुतखाना पीछे छूट गया
मयखाना जब आया तो
मन ही मन मैं हर्षाया
पर तकदीर अपनी बड़ी नि‍राली
बटुआ था सारा खाली
ना पैमाने छलके
ना हुई बन्‍दगी
हसरतों ने ऐसा मारा
सबकुछ पीछे छूट गया
हार गया जब सब से
सोचा खुदकुशी मैं कर लूं
बड़ी मुद्धतों से 'जालि‍म'
मुब्‍ति‍ल्‍ग-जीस्‍त हो फंदा बनाया
फि‍र इस आरजू में
कहीं लौट ना आँए सनम कभी
मौत से बगाबत कर दी
इन्‍तजार में कयामत गुजर गई
ना वो आए ना मइयत उठी
कुछ एसा अफ़साना हुआ
ना जि‍न्‍दा हूं ना दफन हुआ

मंगलवार

क्‍या बापू सचमुच मर चुके हैं ?





क्‍या हुआ? तुम क्‍यों घबरा रहे हो
तुम बेरोजगार हो?
या कोई चल बसा है?
कुछ तो बताओ,
तुम्‍हारी चिंता का कारण क्‍या है?

तुम कहते हो 'जालि‍म'
तो तुम्‍हे बताता हूं
पल पल की खबर रखने वाले
गूढ़ ज्ञानी खबरी ने कहा है
कि‍ बापू मर गए हैं
सबको छोड़ के तर गए हैं
लेकि‍न यह कैसे हो सकता है
बि‍न बापू गान्‍धी के
भारत कैसे जी सकता है
अंहि‍सा, धर्म, और प्रति‍ज्ञा
बि‍न बापू के
सत्‍याग्रह कैसे चल सकता है


भाई तुम्‍हारी जानकारी है आधी
राजघाट में बनी हुई है उनकी समाधी

पर उन सि‍द्धान्‍तो का क्‍या
जो बापू ने दि‍ए थे
नेताजी सुभाष से अलंकृत
बापू राष्‍ट्रपि‍ता बने थे

पर अब तो बस केवल
वोटों कि चोटों पर
बापू दि‍खते हैं नोटों पर
हर कोई अब गाली देता है
अधनगें फकीर की आधी धोती पर
युवा चुटकुले कहता है


परन्‍तु यह कैसे सम्‍भव है
गान्‍धी के चि‍त्रों पर
फूलों का हार चढ़ता है
साबरमती में हर दि‍न
धूप और दीपक जलता है
हर कोई बापू बापू चि‍ल्‍लाता है
गान्‍धीगि‍री का आन्दोलन चलवाता है


तुम बच्‍चे हो मेरे भाई
यह जग बड़ा नि‍राला है
बाहर से उजला उजला
अन्‍दर से काला है
बापू की राह पे चलोगे
तो कुछ नहीं होने वाला है
अब मैं चलता हूं
मुझे बापू पे भाषण देने जाना है


हाय यह क्‍या हो रहा है
हर कोई घड़याली आसूं रो रहा है
अब मैं कि‍ससे पुछूं
बापू आज कहां हैं
या फि‍र खबरी के मुताबि‍क
बापू सचमुच मर चुके हैं

शुक्रवार

काश! मैं परि‍पूर्ण होता

अकेला सा महसूस करता हूं
सौ करोड़ से ज्‍यादा की भीड़ में
इसलि‍ए सोचता हूं
काश! मैं परि‍पूर्ण होता
हर काम अपने दम पे करता
कदम बढ़ाता समाज कल्‍याण की राह पर
पर कभी कि‍सी से मदद ना मांगता
सोचता हूं मैं दीपक होता
अ‍ंधि‍यारा मि‍टाता इस जग का
फि‍र ख्‍याल आता है कि‍ तब भी मैं कैसे सम्‍पूर्ण होता
तल पे अन्‍धेरा रहता नि‍त कालि‍मा उगलता
काश! मैं परि‍पूर्ण होता
हर काम अपने दम पे करता
सोचता हूं मैं दरि‍या होता
इस जग की प्‍यास बुझाता
कि‍न्‍तु यह सम्‍भव नहीं
जल से भरा रहता है समन्‍दर
पर नमकीन पानी को कौन पीता
काश! मैं परि‍पूर्ण होता
हर काम अपने दम पे करता
सोचता हूं मैं इक सि‍तारा होता
वि‍शाल गगन में नि‍शा में चमकता
पर यह भी व्‍यर्थ राहगीर को रोशनी देने में
तब भी असमर्थ रहता
फि‍र सोचता हूं
काश मैं सोमरस होता
मधुशाला में नि‍त मैं छलकता
गमगीन यादों को भुलाकर कुछ पल चैन से बसरने देता
पर अफसोस तब भी घर एजाड़ने के लि‍ए जुमले सहता
काश! मैं परि‍पूर्ण होता
हर काम अपने दम पे करता
पर लगता है इस जग में कोई नहीं सम्‍पूर्ण है
यहीं तक की खुदा भी अधूरा ही है
तभी उसके संसार में दंगा-फसाद उसी के नाम पर होता है
सच तो यह है 'ज़ालि‍म'
कि‍ स्‍वप्‍न भी अ‍पूर्ण होता है
इसलि‍ए कोई नहीं परि‍पूर्ण होता है

मंगलवार

हि‍मालय क्‍यों डगमगा रहा है

उधर देखो, हि‍मालय क्‍यों डगमगा रहा है
ना कोई भूकंप आया है
ना कि‍सी तूफान में ताकत है
फि‍र क्‍या है
जो इस पहाड़ को हि‍ला रहा है
शायद यह नाराज है
हमने जो खून बहाया है
इसकी गोद में
आतंक का दामन छुपाया है
भारत को चीरा
और पाकि‍स्‍तान को बनाया है
खैर थी इतनी भी
पर हमने दुश्‍मनी को बढ़ाया है
यही वजह है शायद
आज हि‍मालय हि‍लता ही जा रहा है
पहले खीचं डाली सरहद
फि‍र आसमां को बाटां
मां की छाती से बच्‍चे को छीना
मजहब के नाम पर
यह क्‍या गुनाह कि‍या
रास ना आया तभी
अडि‍ग गि‍री डगमगा रहा है
सि‍यासत के गलि‍यारों से
गदंगी की बू आती है
जो अमन के बजाए
कारगि‍ल को लाती है
ना छुपने दो उन फरि‍श्‍तों को
ना झुकने दो उन अरमानों कों
जिन्होने दोस्‍ती का दि‍या जलाया है
वरना देख लो अभी से
हि‍मालय डगमगा रहा है
घर जले थे पंजाब में
तपि‍श है अभी उस आग में
देख लो चाहे तुम
महीने लग जाते हैं पहुचने में
अमृतसर और लाहौ्र के
चन्‍द लम्‍हों के फासले में
ना जाने हश्र क्‍या हो्गा
यह हि‍मालय हि‍लता ही जा रहा है
गलती जो कर दी थी कभी
ना दोहराओ तुम अभी
छा जाने दो खुशी
उन बुझे बुझे से चेहरों पर
जो दो ना पायें हैं जी भर
बि‍छड़े हैं जबसे दि‍ल जि‍गर
कैसे भूल जाते हो
दर्द धरती के स्‍वर्ग का
इंसान हैं वो
जीने का हक उन्हे भी दो
दोस्ती का पैगाम लाऔ
तोड़ डालो मुहं उस तीसरे का
जो हुंकारता है दूर से
और हमारे बीच टागं अड़ाता है
देर ना हो जाए कहीं
क्‍योंकि‍ हि‍मालय डगमगा रहा है
सब रास्‍ते खोल दो
मिटा दो सरहद की जंजीरों को
भारत-पाक चलो उस राह पर
जहां अमन नजर आता है
कहीं एसा ना हो जाए 'ज़ालि‍म'
अपवादों की धरती पे
टूट जाए यह पहाड़

और मि‍टा दे सरहद सदा के लि‍ए
यह हो जाएगा
क्‍योंकि‍ हि‍मालय हि‍लता ही जा रहा है

सोमवार

मेरे प्रश्‍न को हल कर दो

जरा सुनो मेरे प्रश्‍न को हल कर दो
तुमने तो पी.एच.डी. कि‍या है
डि‍ग्रि‍यों से तुम्‍हारा घर भरा है
मौलवी साहब रूकि‍ए
अच्‍छा ज्‍योति‍षी जी आप ही सुनि‍ए
अरे कोई तो मुझे बताओ
यह जो खून बि‍खरा पड़ा है
मज़हबी दगों की भेटं चढ़ा है
यह खून कि‍सका है
हि‍न्‍दू का है या कि‍सी मुसलमान भाई का
कि‍सी सि‍क्‍ख का है या फि‍र इसाई का
किसी और का है तो भी बताओ
जरा सुनो मेरे प्रश्‍न को हल कर दो
ऐसी भी क्‍या खता हो गई
जो तुम सुनते भी नहीं
जरा सी बात पूछता हूं
यूं फर्क बता देते हो लाखों
दगों के वक्‍त बताते हो
अब भी बता दो मुझको
जरा इस खून की पहचान करो
फायदे में रहोगे तुम
बि‍मार हो जाओगे कभी
तो देंगें खून तुम्‍हे तुम्‍हारे मजहब का ही
पर अफसोस
तुम नहीं बता सकते
यह जो सुर्ख हुई है धरती
इस पर खून पड़ा है
वो इक इन्‍सान का है
इसलि‍ए चुप हो जाओ
खामोश
क्योंकि मजहब नहीं सि‍खाता
आपस में बैर करना
क्योंकि खून से बड़कर रि‍श्‍ता कोई नहीं
फि‍र तुम सब का तो खून एक सा है
नहीं मानते हो तुम अगर
'जालि‍म' तर्क से समझाओ
और मेरे प्रश्‍न को हल कर दो
लेकि‍न तुम नहीं कर सकते
इसलि‍ए हर जीवन में खुशी का रंग भर दो

शनिवार

मयखाने की दास्‍तां......................

मयखानों में पीने वाले भी क्‍या पीते हैं
चन्‍द पलों के नशे के बाद फि‍र दुनि‍या में जीते हैं

मदहोश तो वो होते हैं 'जालि‍म' जो सदा नशे में रहते हैं
जाम नहीं छलकाते वो महबूबा की आखों से जो पीते हैं
मयखानों में जाने वाले पैमानों को आजमाने वाले
जाम खत्‍म हो जाने पर तन्‍हा तन्‍हा रह जाते हैं

चैन तो मिलता है उनको जो बि‍ना कि‍सी पैमाने के
आखों में आखें डाले अपनी प्‍यास बुझाते हैं

कुछ एसे भी होते हैं 'जालि‍म' जो रोते हैं चि‍ल्‍लाते हैं
दि‍ल के टूटने के बाद मयखाने चले जाते हैं
वो पागल नहीं जानते मयखाने के जाम पल भर याद भुलाते हैं
नशा उतरता है जैसे ही 'जालि‍म' फि‍र अश्‍क बहाते हैं
मयखानों मे जलने वालो रफ़ता रफ़ता मरने वालो
क्‍यों काफि‍र जग के जुमले सहते जाते हो
जामों से क्यों खुद को तड़पाते हो
नि‍त जीने का नशे में रहने का इक राज तुम्‍हे बतलाता हूं
ना कह देना कि‍सी से कि‍ मैं भी इसको अपनाता हूं
नशे के आदि‍ हो तो पी तो महबूबा आखों से पी लो
जाम नहीं, पैमाने नहीं दि‍न रात फि‍र जन्‍नत में जी लो

शुक्रवार

जमीं वाले चादं की कहानी

इक चादं एसा भी है जि·समें दाग़ ही नहीं है
इत्तेफाक यह भी अजब है बेदाग चादं आसमां में नहीं है
जान लो अब वो राज भी तुम जो कभी दफन हो गए
इक भूल हो गई खुदा से और दोनों चादं ही बदल गए
हुआ यूं कि दाग़ जिस चादं में था वो तो सितारों में रस गया
और कुदरत का करिश्मा देखिए बेदाग चादं जमीं पे बस गया
खैर थी इतनी भी 'जालिम' पर हद तो तब हो गई
जमीं बाले चादं के दीदार करने की इजाजत जब हमें मिल गई
बात इतनी भी होती तब भी खैरियत थी
पर सच मानिए उन्हे देखते ही हमें मोहब्बत हो गई

रूस्‍वाइयां.................

हिफ़ाजत से संभाल कर रखा था दिल कमबख्त पल भर में तोड़ कर चले गए
मेरे जिगर की वि·रासत के टुकड़े महबूब की गलियों में बिखर गए

वो शायद चौदहवीं की रात थी और मौसमे बरसात थी
सनम चले जा रहे थे अकेले ही नामालुम क्या बात थी
पछियों की ना जाने कैसी चहचाहट हुई जमीं पर से इक चमक उनके पेहरे पे आ गिरी
उनके हुस्ने-फ़सूंसाज की झलक थी हर खिश्त पे जिस शय से उनकी नज़रें जा मिली
पहले जु़ल्फ़ों को संवारा बडे अदब से फिर शीशा समझ वो टुकड़े उठा लिए
अपनी सूरत को परखा हर खिश्त फिर यकज़ा कर वो सुर्ख टुकड़े बगल में झुपा लिए
मुकाम पे पहुचं कर सनम को फिर उन सुर्ख टुकडों का ख्याल आया
बुलन्द रोशनी में दस दफ़ा मेरे दिल की शहजादी ने उन शीशों का दीदार पाया
छुप ना सका ना सका वो राज अब जिसे कभी हमने बड़े जतन से छुपाया था
शीशे नहीं मेरे दिल के टुकड़े थे वो 'जालिम' जिनको सनम ने रस्ते से उठाया था
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