बुधवार

जनादेश







अब हाथ नहीं फैलाउगां,
ना करूगां कॊई याचिका,
उन बहरॊं की सभा में,
अपनी बात नहीं दॊहराउगां,
सब भाइयॊं से मिलकर,
अब जनादेश सुनाउगां,
बापू के आन्दॊलन कॊ,
मुख्यधारा में लाउगां,
नहीं सुने गर फिर वॊ तॊ,
राजघाट पे मर मिट जाउँगा,
पर अब तॊ बस केवल,
अपना जनादेश सुनाऊँगा,
उन पिछडॊं की बात बताउँगा,
भूमिहीनॊं के दर्द गिनवाउँगा,
कैसे पकती है रॊटी,
यह् हकीकत समझाउँगा,
अपने अधिकारॊं की खातिर,
अब जनादेश सुनाउँगा,
कदम कदम से बढाउँगा,
पदयात्रा में शामिल हॊ जाउँगा,
अब कैसे भी हॊ,
वचितॊं कॊ न्याय दिलवाउँगा,
कान खॊल के सब सुन लॊ,
अब बस जनादेश सुनाउँगा,
बहुत हुई उपेक्षा अपमान,
अब यह ना सह पाउँगा,
राष्ट्रीय भूमि प्राधिकरण की,
अब स्थापना करवाउँगा,
अपने अथक प्रयत्नॊं से,
अब जनादेश सुनाउँगा,
चारॊं ऒर रहे खुशहाली,
इतना ही मैं चाहूँगा,
सबके पास हॊ खुदकी भूमि,
ऎसा भारत बसाउँगा,
जान न्यॊछावर करके भी,
अब जनादेश मनवाउँगा. _________________________________________________________________ भूमिका पाठकगण ध्यान दें कि जनादेश एक आन्दॊलन है जॊ कि देशभर में वचितॊं के लिए लड़ रहा है इसके बारे में अधिक जानने के लिए यहां क्लिक करें,
सुनील डॊगरा जालिम
+91-98918-79501

5 टिप्पणियाँ:

परमजीत बाली ने कहा…

जालिम जी,कविता के जरिए बढिया संदेश दिया है।

Shastri JC Philip ने कहा…

सशक्त ! लिखते रहें, समाज में इस विचारधारा का प्रभाव जरूर होगा -- शास्त्री जे सी फिलिप

देवेश वशिष्ठ ' खबरी ' ने कहा…

जालिम, जनादेश सुनाना जरूरी हो गया है, पर सवाल है किसका जनादेश?
क्या पूर्वाग्रह से ग्रस्त लोगों का, क्या उन लोगों का बनाया जनादेश, जो उन बेसहाराऔं के नाम का इस्तेमाल कर अपना पेट फुला रहे हैं।जनता जनादेश तो दे रही है, पर उस जनादेश को दंगों में बदलने वाले अपनी बात को जनादेश के तौर पर रखते हैं।
आज देश में सात सौ N.G.O. चलते है केवल जनजातियों के नाम पर, और सब यही कर रहे हैं कि कैसे उन जनजातियों को वैसी ही दशाऔं में बनाये रखा जाय।
पाँच सितारा होटलों में बेसहारा वर्ग के नाम पर मींटिंग तय हो रही हैं। पर वो लाचार सदियों से ढर्रे की गुजर बसर कर रहा है।
ये बात थी विचार की।
अब बात कविता की,
सुनील पहले तुम कहना चाहते थे, और कविता बनाते थे, अब तुमसे कविताई हो रही है।
तुम्हारी व्यक्तिगत सोच अच्छी है।
आशीर्वाद।

Tushar Joshi, Nagpur (तुषार जोशी, नागपुर) ने कहा…

आपने क्या करोगे लिख दिया। किसके लिये और क्यों ये मुझे अधिक जरूरी लगता है। समाज की दशा का संवेदनशील वर्णन और ज्यादा हो ऐसा और लिखिये।

बधाई।

sunita (shanoo) ने कहा…

सुनील अच्छा लगा पढ़कर तुम्हारे विचारों में भी क्रान्ति महसूस हो रही है मुझे...

लिखते रहो बहुत अच्छा लिख रहे हो...

सुनीता(शानू)